Wednesday, January 8, 2020

कामयाब होने की ज़िद्द-HINDI STORY

 HINDI STORY 

      कामयाब होने की ज़िद्द

 

मेरा जन्म 1971  में अमृतसर में हुआ। उस दौर  में भारत- पाकिस्तान का युद्ध चल रहा था। जन्म क समय से ही  मेरे पैरो में समस्या  थी,डॉक्टरों ने मेरे परिवार से कहा  की मैं  कभी नहीं चल पाउँगा। लेकिन मेरी माँ ने हार नहीं मानी , वह मुझे दिल्ली लेकर गई और ऑपरेशन करवाया , इसके बावजूद मै सामान्य बच्चो  की तरह चल नहीं पता था। मेरे चलने को लेकर लोग मेरा मज़ाक बनाते थे,तो मेरी माँ उनसे कहती थी , की यह चलने के  लिए नहीं
 उड़ने क लिए पैदा हुआ है। ताने और मज़ाक की वजह से खेलने की जगह उस उम्र में घर की रसोई में माँ की मदद किया करता था। वही से मेरे अंदर खाना  बनाने की रूचि पैदा हुई।
मैंने मणिपाल अकादमी ऑफ़  हायर एजुकेशन से स्नातक किया।  अमेरिका जाने के बाद कॉर्न यूनिवर्सिटी से क्यूनारी इंस्टिट्यूट से और न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी से पढ़ाई  की। मेरा परिवार मध्यवर्गीय था। मेरी दादी अमृतसर की छोटी सी गली में पराठे बनती थी और मैं  पराठे बेचता था। मेरे पिता की वीडियो कैसेट की दूकान थी। स्कूल के बाद मै  पापा के  व्यापार में हाथ बटाता था। बाद में पापा ने बुनाई की मशीन लगाई , जिससे वो कम्बल बनते थे। मै अपने घर में सबसे कलात्मक व्यक्ति था। मै उस शोर करने वाली मशीन के  पास गया और दो रातो तक कठिन परिश्रम करके एक बहुत सूंदर दिखने वाला कंबल  बनाया , लेकिन उसे किसी ने नहीं खरीदा।  पिता द्वारा बनाये गये वर्टीकल पैटर्न वाला कंबल चाहते थे।


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केवल मेरी दादी ने मेरे काम की सराहना की , उन्होंने मुझे सपोर्ट  किया। उस समय मेरी उम्र  17 साल थी जब मैंने एक उद्यमी के रूप में खुद के भरोसे लॉरेंस गार्डन की शुरवात  की। मैं अपने कैटरिंग के काम को आगे बढ़ाना चाहता था। मेरे परिवार ने इसका समर्थन किया। आज छोटे छोटे बच्चे मिलकर कहते है की मुझे भी सैफ  बनना है, पर जब मैंने ऐसे शुरु किया था लोग ऐसे बहुत छोटा काम समझते थे। वो कहते थे बावर्ची बन कर
क्या करेगा ?यह कोई प्रोफेशन है। एक बार मैंने एक किटी पार्टी का काम संभाला। पहली पार्टी में आयी महिलाओ  ने मेरे खाने की बहुत तारीफ़ की, मैंने उत्साहित  होकर उनसे पैसे नहीं लिए। इस पर पापा ने पूछा पैसे नहीं लोगे तो व्यापार को आगे कैसे बढ़ाओगे। लेकिन ये सच है कि न तो तब मैंने पैसो  के लिए काम किया ,और न अब केवल पैसो के लिए काम करता हूँ ।
 अपने जूनून को लेकर मैं दिल्ली चला गया और वह मै एक विदेशी सैफ के साथ काम करने लगा। जब लोग उसके सामने  मेरी तारीफ़ करने लगे तो इस पर वो चिड़ने लगा। एक दिन उसने जानबूज़कर मेरे हाथ को जख्मी करने की कोशिश  की  ,तब मुझे एहसास हुआ की वो नौकरी मेरा गुरुर छीन रही है। मैंने तभी फैसला  लिया की एक दिन मै कुछ बनकर दिखाऊँगा। इसके बाद मैंने ताज होटल ,ओबेरॉय होटल,वेलकम ग्रुप,लील ग्रुप होटल्स के लिए काम किया। इसके बाद न्यूयोर्क में शुरु किये गए मेरे जुनून रेस्तरा ,जो भारतीय खाने के लिए वह मशहूर है , को मिशलीन अवार्ड से  नवाज़ा गया।
इसके बाद मैंने भारतीय त्यौहार पर किताब लिखी :अ क्यूलिनेरी एपिक ऑफ़ इंडियन फेस्टिवल ,जिसे लिखने में 12 साल लग गए। इस किताब की तारीफ़ विश्व की प्रशिद्ध  हस्तियों ने की। में हमेशा कुछ नया  करने का प्रयास करता हूँ। पिछले साल आयी फिल्म थे लास्ट कलर्स ,जो मेरी किताब के हिस्से  पर आधारित है,इस साल ऑस्कर के लिए नामित किया गया है।

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